दर्द


(शायेरी)

युही नही होती दर्द जुवां से बयां
अक्सर घाव किस्तो में मिलते हैं
हो ना हो ये हमारे दुश्मन, पर
खुदगर्ज यहाँ तमाम मिलते हैं।



हम तो मिटे मिटाए है खुद ही
फिरभी चोट अनगिनत मिलते हैं
जो लुटा हो हर बाजार में, उसे
खरीदार भी बेचने वाला ही मिलते है।



बहाना खुशियोका होता है पर
आखिर गंगा से जमुना मिलते है
अब क्या पूछे बहते आँशुओ से
जहाँ तकलीफ की वजह मिलते है।

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